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pramod tiwari best shayari

Pramod Tiwari Best shayari


 पूछो मत क्या गुजरी प्यार निभाने में

आग लगा ली हमने आग बुझाने में..


आये हो तो आँखों में कुछ देर रहो 

उम्र गुजर जाती है ख्वाब सजाने में 

pramod tiwari


सच है गाते गाते हम भी थोड़ा सा मशहूर हुए,

लेकिन इसके पहले पल-पल,तिल-तिल चकनाचूर हुए।

चाहे दर्द जमाने का हो चाहे हो अपने दिल का,

हमने तब-तब कलम उठाई जब-जब हम मजबूर हुए।

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हम तो पिंजरों को परों पर रात-दिन ढोते नहीं,

आदमी हैं -हम किसी के पालतू तोते नहीं ।


क्यों मेरी आँखों में आँसू आ रहे हैं आपके

आप तो कहते थे कि पत्थर कभी रोते नहीं।


आप सर पर हाथ रखकर खा रहे हैं क्यों कसम,

जिनके दामन पाक हों वो दाग को धोते नहीं।


ख्वाब की चादर पे इतनी सिलवटें पड़ती नहीं,

हम जो सूरज के निकलने तक तुम्हें खोते नहीं।


दिल के बटवारे से बन जातीं हैं घर में सरहदें,

कि सरहदों से दिल के बटवारे कभी होते नहीं।


क्यों अँधेरों की उठाये घूमते हो जूतियाँ,

क्यों चिरागों को जलाकर चैन से सोते नहीं।


हम तो पिंजरों को परों पर रात-दिन ढोते नहीं,

आदमी हैं -हम किसी के पालतू तोते नहीं ।

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याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों बाले दिन दस पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन

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चाँद तुम्हें देखा है पहली बार

ऐसा क्यों लगता लगता हर बार

कभी मिले फुरसत बतलाना यार,

ऐसा क्यों लगता मुझको हर बार!


बादल के घूँघट से बाहर जब भी तू निकला है

मैं क्या,मेरे साथ समंदर तक मीलों उछला है,

आसन पर बैठे जोगी को जोग लगे बेकार,

चाँद तुम्हें देखा है पहली बार,

ऐसा क्यों लगता मुझको हर बार।

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राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं

ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं

आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं

अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।


मेरे घर के आगे एक खिड़की थी,

खिड़की से झांका करती लड़की थी,

इक रोज मैंने यूँ हीं टाफी खाई,

फिर जीभ निकाली उसको दिखलाई,

गुस्से में वो झज्जे पर आन खड़ी,

आँखों ही आँखों मुझसे बहुत लड़ी,

उसने भी फिर टाफी मंगवाई थी,

आधी जूठी करके भिजवाई थी।


वो जूठी अब भी मुँह में है,

हो गई सुगर हम फिर भी खाते हैं।

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं

ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।


दिल्ली की बस थी मेरे बाजू में,

इक गोरी-गोरी बिल्ली बैठी थी,

बिल्ली के उजले रेशम बालों से,

मेरे दिल की चुहिया कुछ ऐंठी थी,

चुहिया ने उस बिल्ली को काट लिया,

बस फिर क्या था बिल्ली का ठाट हुआ,

वो बिल्ली अब भी मेरे बाजू है,

उसके बाजू में मेरा राजू है।


अब बिल्ली,चुहिया,राजू सब मिलकर

मुझको ही मेरा गीत सुनाते हैं।

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं

ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।


एक दोस्त मेरा सीमा पर रहता था,

चिट्ठी में जाने क्या-क्या कहता था,

उर्दू आती थी नहीं मुझे लेकिन,

उसको जवाब उर्दू में देता था,

एक रोज़ मौलवी नहीं रहे भाई,

अगले दिन ही उसकी चिट्ठी आई,

ख़त का जवाब अब किससे लिखवाता,

वह तो सीमा पर रो-रो मर जाता।


हम उर्दू सीख रहे हैं नेट-युग में,

अब खुद जवाब लिखते हैं गाते हैं।

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं

ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।


इक बूढ़ा रोज गली में आता था,

जाने किस भाषा में वह गाता था,

लेकिन उसका स्वर मेरे कानों में,

अब उठो लाल कहकर खो जाता था,

मैं,निपट अकेला खाता सोता था,

नौ बजे क्लास का टाइम होता था,

एक रोज ‘मिस’नहीं मेरी क्लास हुई,

मैं ‘टाप’ कर गया पूरी आस हुई।


वो बूढ़ा जाने किस नगरी में हो,

उसके स्वर अब भी हमें जगाते हैं ।

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं

ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।


इन राहों वाले मीठे रिश्तों से,

हम युगों-युगों से बँधे नहीं होते,

दो जन्मों वाले रिश्तों के पर्वत,

अपने कन्धों पर सधे नहीं होते,

बाबा की धुन ने समय बताया है,

उर्दू के खत ने साथ निभाया है,

बिल्ली ने चुहिया को दुलराया है,

जूठी टाफी ने प्यार सिखाया है।


हम ऐसे रिश्तों की फेरी लेकर,

गलियों-गलियों आवाज लगाते हैं,

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं

ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।


राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं

ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं,

आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं

अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।

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मुश्किलों से जब मिलो आसान होकर ही मिलो,

देखना,आसान होकर मुश्किलें रह जायेंगीं।


दिल़ में वो महकता है किसी फूल की तरह,

कांटे की तरह ज़ेहन में जो है चुभा हुआ ।


ये क्यों कहें दिन आजकल अपने खराब हैं,

कांटों से घिर गये हैं ,समझ लो गुलाब हैं।


मैं झूम के गाता हूँ ,कमज़र्फ जमाने में,

इक आग लगा ली है,इक आग बुझाने में।


ये सोच के दरिया में ,मैं कूद गया यारों,

वो मुझको बचा लेगा ,माहिर है बचाने में।


आये हो तो आँखों में कुछ देर ठहर जाओ

इक उम्र गुज़रती है ,इज ख्वाब सजाने में।


मैं दोस्ती में दोस्तों के सितम सह लूंगा,

दगा ने दें तो दुश्मनों के साथ रह लूँगा।


क्यों किसी भी हादसे से कोई घबराता नहीं ,

इस शहर को क्या हुआ ,कुछ समझ में आता नहीं।


कुछ न कुछ मकसद रहा होगा भी शायर का जरूर,

बेवजह हर शेर चट्टानों से टकराता नहीं।


मैना हमारे सामने गिरते ही मर गई,

कैसे कहें गुलेल मदारी के पास है।


मुस्करा कर जो सफर में चल पड़े होंगे,

आज बन कर मील के पत्थर खड़े होंगे।


ऐसा क्या है खास तुम्हारे अधरों में,

ठहर गया मधुमास तुम्हारे अधरोंमें।


लाख था दुश्मन मगर ये कम नहीं था दोस्तों,

बद्‌दुआओं के बहाने नाम वो लेता तो था।


मुझे सर पे उठा ले आसमां ऐसा करो यारों,

मेरी आवाज में थोडा़ असर पैदा करो यारो।


यूं सबके सामने दिल खोलकर बातें नही करते,

बड़ी चालाक दुनिया है जरा समझा करो यारो।

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