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Heart Touching Stories in Hindi:

 Heart Touching Stories in Hindi: अदभुत कहानी !!


 एक बार की बात है। एक बार एक अध्यापक एक संपन्न परिवार के शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे।
 तो उस शिष्य को कुछ मजाक सूझी क्योंकि उसको रास्ते में किसी गरीब मजदूर के जूते दिखाई दिए।
 उसने अध्यापक से कहा गुरु जी अगर हम इन जूतों को छुपा दे तो कितना मजा आएगा?

 देखते हैं कि मजदूर पर इसका क्या असर पड़ता है?
अब उसको तो मजाक सूझ रहा था। लेकिन गुरु जी ने कहा। कि नहीं? गरीब इंसान के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है उसने कहा

 क्यों ना? हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और देखें कि इसका इस गरीब गरीब मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है? उन्होंने ऐसा ही किया।

 जैसे ही मजदूर अपना काम करके लौटा। और उसने एक पाँव अपने जूते में डाला। तो उसको कुछ कठोर सा महसूस हुआ उसने अंदर हाथ डाला तो उसको कुछ सिक्के दिखाई दिए वह थोड़ा आश्चर्य में पड़ गया आसपास किसी को देखा तो कोई भी दिखाई नहीं दिया।

 वापस उसने दूसरा पैर अपने जूते में डाला और वापस उसको उसमें कुछ सिक्के दिखाई दिए। अब दोनों जूतों के सिक्कों को उसने अपने हाथों में रखा। और? प्रभु की तरफ इशारा किया हे प्रभु पता नहीं। किस भले मानुष ने? यह सिक्के मेरे जूतों में छुपाए है लेकिन जिसने भी छुपाए हैं। उसको मेरी दुआ है ताकि इन पैसों से,

मैं अपने बच्चों और पत्नी के लिए कुछ खाना और दवाइयां ला सकूं सकूंगा और इतना बोल कर वह चला गया। इस बात को शिष्य और अध्यापक दोनों सुन रहे थे अब अध्यापक ने शिष्य से पूछा कि अब तुम मुझे बताओ कि तुम्हें कैसा महसूस हुआ तुम्हारी पहले वाली मजाक या मेरा यह तरीका


 तो उसने कहा कि गुरु जी? मैं आपसे क्षमा चाहता हूं। अब मुझे समझ आ गया है कि सच्ची खुशी किस चीज में है जब हम किसी की मजाक उड़ाते हैं तो हमें कुछ पल का आनंद मिलता है लेकिन इससे हमें बद्दुआ मिलती है। लेकिन
अगर हम किसी की मुश्किल परिस्थिति में मदद करते हैं और जिसकी भी हम मदद करते हैं उसको भी नहीं पता कि हमने उसकी मदद की है लेकिन अंदर ही अंदर हमें पता है कि हमने उस इंसान की मदद की है। यही सच्ची खुशी है जब हम दूसरों को खुशी देते हैं तो हमें सच्ची खुशी मिलती है।

 इसी तरह खुशियां बांटते रहिए लोगों की मदद करते रहिए। 
और दान करते रहिए जिसके भी आप काबिल हो। जितना भी आप से बन पड़े,दान करे,लेकिन दान जरूर करें। 

इसका मतलब यह नहीं है कि आपको कंपलसरी या  अनिवार्य रूप से इतने रुपए दान करने ही चाहिए। क्योंकि हर किसी की जरूरत अलग अलग हो सकती है।



अदभुत कहानी !!

उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला, मैं रेलवे स्टेशन पहुंचा, पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई चारा नही था। मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी मैं होटल की ओर जा रहा था।

अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी, दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण अस्थिपिंजर साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे। छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था, मैं अचानक रुक गया दौड़ती भागती जिंदगी में यह ठहर से गये।

जीवन को देख मेरा मन भर आया सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें 10 रु देकर आगे बढ़ गया। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हुँ मैं, 10 रु क्या मिलेगा, चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा।

मैंने बच्चों से कहा: कुछ खाओगे ? बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रहा हुँ, तुम भी कर लो, वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए। उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डाट दिया और भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगा।

होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा…
उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी कुछ निराली ही थी।

मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना। और फिर दोपहर-शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला।

वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द आदर मे परिवर्तित हो चुके थे। मैं स्टेशन की ओर निकला, थोडा मन भारी लग रहा था मन थोडा उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था। रास्ते में मंदिर आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा हे भगवान! आप कहा हो ? इन बच्चों की ये हालत ये भूख, आप कैसे चुप बैठ सकते है।

दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया,
पुत्र अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था?
क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया।

मैं स्तब्ध हो गया, मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए!
ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो। मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र है उसके कार्य कलाप के वो महान है। भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है जब वह हमे उस काम के लायक समझता है, किसी मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना।

अतः आपको कोई भुखा या लाचार मिले
या आप से कुछ खाने के लिये मागे
तो आप अपनी सार्मथ्य अनुसार मदद जरूर करें।

क्योकि… स्वयं भगवान ने आप को इस काम के लिये चुना है।

चलिये आज की सुहानी सुबह का शुभारम्भ करें
कुछ इसी संकल्प के साथ कि भिक्षावृत्ति को हम बढ़ावा ना दें
लेकिन अशक्त,लाचार और भूखे की मदद हम जरूर करें।
ईश्वर से प्रार्थना हमें सद्बुद्धि प्रदान करें और इस लायक बनाए।

“हम बदलेंगें युग बदलेगा, हम सुधरेंगें युग सुधरेगा”

पहले अपना आप सुधारे आओ यारो मिलजुल कर हम मानवता का रूप निखारे!



ईमानदारी का इनाम ! बाप बेटा की अदभुत कहानी !!

इस साल मेरा सात वर्षीय बेटा दूसरी कक्षा मैं प्रवेश पा गया!!
क्लास मैं हमेशा से अव्वल आता रहा है!
पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो…
मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाज़ार ले गया !

बेटे ने जूते लेने से ये कह कर मना कर दिया की
पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरुरत है
वो अभी इस साल काम दे सकते हैं!

अपने जूतों की बजाये उसने मुझे अपने दादा की कमजोर हो चुकी
नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा !

मैंने सोचा बेटा अपने दादा से शायद बहुत प्यार करता है
इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी

समझ रहा है ! खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा
और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा…..

दुकानदार ने बेटे के साइज़ की सफ़ेद शर्ट निकाली …
डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी…..
फिर भी बेटे ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा !!!!

मैंने बेटे से कहा : बेटा ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है
तो फिर और लम्बी क्यों ?

बेटे ने कहा :पिता जी मुझे शर्ट निक्कर के अंदर ही डालनी होती है
इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा…….
लेकिन यही शर्ट मुझे अगली क्लास में भी काम आ जाएगी ……
पिछली वाली शर्ट भी अभी नयी जैसी ही पड़ी है
लेकिन छोटी होने की वजह से मैं उसे पहन नहीं पा रहा !

मैं खामोश रहा !!

घर आते वक़्त मैंने बेटे से पूछा : तुम्हे ये सब बातें कौन सिखाता है बेटा ?

बेटे ने कहा: पिता जी मैं अक्सर देखता था कि कभी माँ अपनी साडी छोड़कर
तो कभी आप अपने जूतों को छोडकर हमेशा मेरी किताबों और कपड़ो पैर पैसे खर्च कर दिया करते हैं !
गली- मोहल्ले में सब लोग कहते हैं के आप बहुत ईमानदार आदमी हैं!
और हमारे साथ वाले राजू के पापा को सब लोग चोर, कुत्ता, बे-ईमान, रिश्वतखोर और जाने क्या क्या कहते हैं,
जबकि आप दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं…..

जब सब लोग आपकी तारीफ करते हैं तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है…..

मम्मी और दादा जी भी आपकी तारीफ करते हैं !
पिता जी मैं चाहता हूँ कि….
मुझे कभी जीवन में नए कपडे, नए जूते मिले या न मिले
लेकिन कोई आपको चोर, बे-ईमान, रिश्वतखोर या कुत्ता न कहे !!!!!

मैं आपकी ताक़त बनना चाहता हूँ पिता जी, आपकी कमजोरी नहीं !

बेटे की बात सुनकर मैं निरुतर था!
आज मुझे पहली बार मुझे मेरी ईमानदारी का इनाम मिला था !!
आज बहुत दिनों बाद आँखों में ख़ुशी, गर्व और सम्मान के आंसू थे…!!

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