header ads

condition of farmers in india in hindi why farmers are protesting in india

why farmers are protesting in india किसानों की बात करने वाली यूपी सरकार ने 3 साल से गन्ने के रेट नहीं बढ़ाए

current situation of farmers in India 2022 farmers condition in India latest news about farmers in India present condition of Indian farmers ppt essay on the present condition of farmers in India in Hindi why farmers are protesting in India

जैसे खाद्यान्न का एमएसपी तय होता है वैसे गन्ने का एसएपी भी तय होता है. लेकिन यूपी के किसान पिछले 3 साल से इसके बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं.

एक गणित लगाकर देखिए. पिछले 3 साल में चीनी के दाम कितने बढ़े हैं. अगर आप मोटा मोटी अदांजा भी लगाएंगे तो कम से कम 50 फीसदी का फर्क आपको नजर आएगा. अब इस चीनी को बनाने में इस्तेमाल होने वाले गन्ने की कहानी सुनिए. यूपी देश में सबसे ज्यादा (लगभग 38 फीसदी ) गन्ना पैदा करता है. यूपी में गन्ने का रेट पिछले 3 साल से एक ही जगह पर बना हुआ है. सरकार ने इस साल भी इसे नहीं बढ़ाया है. मतलब किसानों को पिछले 3 साल से एक ही कीमत पर अपना गन्ना बेचना पड़ रहा है. देखा जाए तो यह कुछ ऐसा ही है, कि पिछले 3 साल से सरकार ने गन्ना किसानों के लिए एमएसपी में कोई बढ़ोतरी नहीं की है. क्या ये सिर्फ यूपी के गन्ना किसानों का ही रोना है या बाकी राज्यों का भी यही हाल है? क्या गन्ना किसानों के लिए भी MSP की तरह का कोई सिस्टम है? अगर है तो यह कैसे काम करता है? आइए सब जानते हैं तफ्सील से.

why farmers are protesting in india


सबसे पहले यूपी का हाल

यूपी की योगी सरकार ने वर्तमान 2019-20 के मार्केटिंग साल के लिए गन्ने का फिक्ट रेट (SAP) 310 रुपए, 315 रुपए और 325 रुपए प्रति क्विंटल रखा है. तीन रेट वैराइटी के हिसाब से रखे गए हैं. मतलब 310 वाली कमतर वैराइटी, 315 वाली मंझोली और 325 वाली बेहतरीन. यूपी में तकरीबन आधी फसल मझोली कैटेगिरी में ही आती है. सरकार ने पिछले 3 सालों से गन्ने की कीमत में कोई भी इज़ाफा नहीं किया है. 2017 में जब यूपी में योगी सरकार आई थी तब ही प्रति क्विंटल पर 10 रुपए की बढ़ोत्तरी की गई थी.


हालांकि इस साल केंद्र सरकार ने गन्ने पर FRP (उचित एवं लाभकारी मूल्य) को 10 रुपए बढ़ा दिया है. इसके साथ ही केंद्र की FRP 275 से बढ़कर 285 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है. साथ ही चीनी के मिनिमम सेलिंग प्राइस को भी 2 रुपए बढ़ाकर 33 रुपए प्रति किलो करने की बात भी कही है. यह सब पढ़ने के बाद आपके दिमाग में दो टर्म SAP और FRP घूम रहे होंगे. तो आइए सबसे पहले इनके बारे में ही जान लेते हैं.


PPE किट ख़राब कैसे आई इसकी नहीं, ख़राब PPE किट की बात कैसे लीक हुई, यूपी सरकार इसकी जांच कर रही है.

यूपी में पिछले 3 साल में गन्ना खरीदी के दाम में कोई इजाफा नहीं हुआ है. पिछली बार 10 रुपए की बढ़ोत्तरी तब हुई थी जब 2017 में योगी सरकार सत्ता में आई थी.

क्या होते हैं गन्ने के FRP और SAP

यह सरकारों की तरफ से किसानों के हक में बनाई गईं व्यवस्थाएं हैं. केंद्र और राज्य सरकारें गन्ने की फसल का एक न्यूनतम मूल्य तय करती हैं. इस मूल्य या इससे ऊपर ही चीनी मिलें गन्ने की खरीद करने को बाध्य होती हैं.


# जब केंद्र सरकार शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर 1966 के तहत एक मिनिमम प्राइस तय करती है, तो उसे FRP यानी Fair and Remunerative Price कहती है. Fair and Remunerative Price का मतलब होता है उचित एवं लाभकारी मूल्य. सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह बढ़ती महंगाई और जरूरतों को देख कर ही गन्ने की मिनिमम कीमत तय करेगी.


# साल 1970 से कुछ राज्यों की सरकारें भी अपने हिसाब से गन्ने का न्यूनतम मूल्य तय करती हैं. इसे स्टेट एडवाजरी प्राइस या SAP कहा जाता है. इसका उद्देश्य गन्ना पैदावार करने वाले किसानों को प्रोत्साहित करना और सही कीमत उपलब्ध करना है. जैसा कि हम आपको पहले ही बता चुके हैं, इस साल यूपी में गन्ने की किस्म के हिसाब से SAP को 310 रुपए, 315 रुपए और 325 रुपए प्रति क्विंटल रखा गया है. साल 2009 में इन कीमतों के बाध्यकारी न होने को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने SAP को सही करार दिया. SAP जारी करने वाले राज्यों में यूपी के अलावा तमिलनाडु, हरियाणा, पंजाब आदि भी हैं. हर राज्य में SAP अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन है FRP चूंकि केंद्र सरकार जारी करती है, इसलिए यह एक समान ही रहती है.


फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य केंद्र सरकार तय करती है. वहीं गन्ना के लिए अलग से समर्थन मूल्य तय किया जाता है.

MSP और FRP-SAP में फर्क क्या है

एफआरपी और एसएपी दोनों ही गन्ना किसान के लिए समर्थन मूल्य की तरह हैं. इससे आपको लग सकता है कि ये भी खाद्यान्न उगाने वाले एमएसपी जैसा ही है. लेकिन इन दोनों में बहुत फर्क है.


# एमएसपी जहां पूरे देश भर पर लागू होती है, वहीं एसएपी को राज्य भी जारी कर सकती है.

# एमएसपी पर सरकार भी खाद्यान्न खरीदती है और कम दाम पर सब्सीडी के साथ गरीबों को उपलब्ध करती है. लेकिन गन्ने के साथ सरकार ऐसा नहीं करती. गन्ना खरीदने का काम शुगर मिल करती हैं. शुगर मिल को केंद्र सरकार की FRP या राज्य सरकार की SAP पर ही गन्ना खरीदना होता है.


# एमएसपी कई खाद्यान्न  पर दिया जाता है. FRP-SAP का सिस्टम सिर्फ गन्ने पर है.

यूपी में किस सरकार में कितना बढ़ा गन्ने का SAP

साल 1999 के बाद की बाद करें तो अब तक यूपी में बीजेपी की सरकार तकरीबन 6 साल रही है. इन 6 सालों में SAP सिर्फ 20 रुपए ही बढ़ा है. एक साल में गन्ने की SAP में सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी साल 2012-13 में देखी गई थी. उस साल गन्ने की कीमत 40 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ी थी. यह समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार के दौरान हुआ था.


1999-2001 के बीच भी बीजेपी की सरकार ने सत्ता में रहने के दौरान गन्ने की SAP में 10 रुपए का इजाफा किया था. समाजवादी पार्टी के 8 साल के शासनकाल में गन्ने पर एसएपी कुल 95 रुपए बढ़ी है. हालांकि गन्ने की सबसे ज्यादा कीमत बढ़ाने वाली सरकार की बात की जाए तो बहुजन समाज पार्टी सबसे आगे है. बसपा के 7 साल के कार्यकाल में SAP 120 रुपए बढ़ा.


यूपी में मायावती सरकार के 8 साल के शासनकाल में गन्ने का समर्थन मूल्य 120 रुपए बढ़ा. यह पिछले 2 दशक में किसी भी सरकार में सबसे ज्यादा है.

बाकी राज्यों में क्या हालात हैं?

यूपी के अलावा दूसरे राज्यों में भी गन्ना किसानों की हालत कुछ ज्यादा बेहतर नहीं नजर आती. आइए जानते हैं एक नजर दूसरे राज्यों पर भी.


तमिलनाडु – साल 2018-19 तक एसएपी 275 रुपए प्रति क्विंटल था. यह पिछले 4 सालों से एक जैसा ही था. सरकार एसएपी का सिस्टम अब खत्म कर दिया है. सरकार एक नए मॉडल लेकर आई है. इसे रेवेन्यू शेयरिंग फॉर्म्यूला या RSF कहा गया है. मतलब शुगर मिल अपने फायदे का एक हिस्सा किसानों से शेयर करेंगे. राज्य के किसान संगठनों में इससे खुश नहीं हैं.


हरियाणा – पिछले साल हरियाणा सरकार ने एसएपी में 10 रुपए की बढ़ोतरी की थी. इस तरह 2020-21 के लिए गन्ने की दर (राज्य निर्धारित मूल्य/ SAP) बढ़ाकर 350 रुपये प्रति क्विंटल करने हो गई है. यह फिलहाल देश में किसी भी राज्य में दी जाने वाली सबसे ज्यादा एसएपी है.


पंजाब – 2019-20 के पेराई सत्र के लिए पंजाब में गन्ने की स्टेट एडवाईसड प्राइस (SAP) में कोई बदलाव नहीं हुआ. राज्य में उगाए जाने वाले गन्ने की तीन अलग-अलग किस्में 295 रुपये, 300 रुपये और 310 रुपये प्रति क्विंटल कीमत पर बिक रही हैं.


गन्ने की समर्थन कीमतें हर राज्य में अलग-अलग होती हैं. 

समस्या इससे आगे भी है

यह सब को गन्ने की कीमत का मामला था. लेकिन समस्या इससे आगे की भी है. जितना गन्ना मिलें खरीद लेती हैं, उसका करोड़ों का भुगतान अटका पड़ा है. यूपी समेत पूरे देश में गन्ना किसानों के बकाए के भुगतान के लिए एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 12 फरवरी को यूपी और महाराष्ट्र समेत 15 गन्ना उत्पादक राज्यों को नोटिस जारी किया है. मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने दायर याचिका के मुताबिक 10 सितंबर 2020 तक देशभर के गन्ना किसानों का करीब 15,683 करोड़ रुपए बकाया है. इसमे सबसे अधिक 10,174 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश के किसानों का है. याचिका में कहा गया है कि गन्ने का भुगतान न होने से किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं. बकाए का भुगतान न करने वाली चीनी मिलों को डिफाल्टर घोषित कर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है.


9 फरवरी को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में उपभोक्ता, मामले खाद्य एवं सार्वजानिक वितरण मंत्रालय ने बताया 31 जनवरी 2021 तक देशभर की चीनी मिलों पर किसानों का 16 हजार 883 करोड़ रुपए बकाया है. अकेले चालू सीजन 2020-21 में सबसे ज्यादा यूपी की चीनी मिलों पर 7 हजार 555.9 करोड़, दूसरे नंबर पर कर्नाटक 3 हजार 585.18 करोड़ रुपए और तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र के किसानों के मिलों पर 2 हजार 30.31 करोड़ रुपए बाकी है.

Republic Day Parade 2022 गणतंत्र दिवस पर क्यों होती है परेड, जानिए रोचक बातें..

गणतंत्र दिवस परेड (Republic Day Parade) की रिहर्सल 17, 18, 20 और 21 जनवरी को होगी. परेड में भारतीय सेना के विभिन्न रेजिमेंट, वायुसेना, नौसेना आदि सभी भाग लेते हैं.


Republic Day Parade 2022: गणतंत्र दिवस पर क्यों होती है परेड, जानिए रोचक बातें..

 परेड में झांकियां भी निकाली जाती हैं.


नई दिल्ली: गणतंत्र दिवस (Republic Day) पर हर साल राजपथ पर परेड होती है. 26 जनवरी (26 January) को होने वाली परेड (Republic Day Parade) की तैयारी तेजी से चल रही है. 17, 18, 20 और 21 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड की रिहर्सल होगी. गणतंत्र दिवस की भव्य परेड में भारतीय सेना के विभिन्न रेजिमेंट, वायुसेना, नौसेना आदि सभी भाग लेते हैं. इसके साथ ही परेड में झांकियां निकाली जाती हैं. इस बार जिन 15 विभागों की गणतंत्र दिवस परेड में झांकी निकलेंगी, उनमें कृषि विभाग की दो झांकियां शामिल हैं. इसके साथ ही जेल, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, समाज कल्याण, नगरीय प्रशासन, ऊर्जा विभाग, आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति, महिला एवं बाल विकास, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, लोक निर्माण, वन, जल संसाधन, ग्रामोद्योग, संस्कृति एवं पर्यटन तथा कौशल विकास, तकनीकी शिक्षा एवं रोजगार, विज्ञान और प्रौद्योगिक विभाग की एक-एक झांकी परेड में शामिल होंगी.

गणतंत्र दिवस परेड से जुड़ी रोचक बातें

गणतंत्र दिवस की भव्य परेड देश की एकता अखंडता सांस्कृतिक विविधता और सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए आयोजित की जाती है. 

गणतंत्र दिवस की भव्य परेड नई दिल्ली स्थित राजपथ पर आयोजित की जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं 1950 से लेकर 1954 ईस्वी तक परेड का आयोजन स्थल राजपथ नहीं हुआ करता था? इन वर्षों के दौरान 26 जनवरी की परेड का आयोजन क्रमशः इरविन स्टेडियम (अब नेशनल स्टेडियम), किंग्सवे, लाल किला और रामलीला मैदान में किया गया था. 

26 जनवरी की परेड की शुरुआत राष्ट्रपति के आगमन के साथ होती है. सबसे पहले राष्ट्रपति के घुड़सवार अंगरक्षकों के द्वारा तिरंगे को सलामी दी जाती है, उसी समय राष्ट्रगान बजाया जाता है और 21 तोपों की सलामी दी जाती है. हालांकि वास्तव में 21 तोपों से फायरिंग नहीं होती है, बल्कि भारतीय सेना के 7 तोपों, जिन्हें “25 पौन्डर्स” कहा जाता है, के द्वारा तीन-तीन राउंड की फायरिंग की जाती है.

26 जनवरी 1955 में राजपथ पर आयोजित पहले गणतंत्र दिवस समारोह में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद विशेष अतिथि बने थे,

हर साल गणतंत्र दिवस की परेड में गीत “Abide with Me” निश्चित रूप से बजाया जाता है क्योंकि यह महात्मा गांधी का पसंदीदा गीत था. हालांकि अब इस गीत को हटाकर इसके स्थान पर भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को बजाया जाएगा.

Post a Comment

0 Comments